ISSN : 2231-4989

वर्हाडी बोली पर हिंदी का वाक्यस्तरीय प्रभाव - विजय सागर

 वर्हाडी बोली महाराष्ट्र के विदर्भ प्रांत में बोली जानेवाली एक मुख्य बोली है। यह बोली प्रमुख रूप से विदर्भ के ग्रामीण क्षेत्रों में बोली जाती है। प्राचीन परंपराओं के कारण इस बोली को वर्हाड यह नाम पड़ा। वर्हाडी बोली को प्राचीन माना गया है और इसका ठोस दावा लीलाचरित्र, गोविंदप्रभुचरित्र आदि महानुभावीय ग्रांथिक भाषाओं में दिखाई पडता है। प्रस्तुत आलेख में वर्हाडी बोली की वाक्यस्तरीय व्यवस्था पर प्रयुक्त हिंदी प्रभाव को स्पष्ट किया गया है। आज के इस आधुनिक युग में मनुष्य अपने विचारों को मौखिक और लिखित दोनों रूपों में व्यक्त कर सकता है। लिखित रूप में इसका प्रयोग एक जैसा होता है, लेकिन मौखिक रूप में यह अलग-अलग प्रांतों में अलग-अलग रूप में बोली जाती है। इसलिए जब विदर्भ का कोई आदमी पश्चिम महाराष्ट्र या मराठवाडा प्रांत में चला जाए तो उसके व्यवहार एवं बोलने की शैली के आधार पर तुरंत पहचान में आ जाता है कि यह व्यक्ति विदर्भ से है। यही स्थिति पश्चिम महाराष्ट्र या मराठवाडा प्रांत के व्यक्ति के संदर्भ में भी दिखाई देती है। कहने का तात्पर्य यह है कि, व्यक्ति जब किसी भाषा का प्रयोग एक सीमित क्षेत्र से दूसरे सीमित क्षेत्र में करता है, तब उसके संप्रेषण में भाषा के सभी स्तरों में परिवर्तन दिखाई देता है। यह परिवर्तन मुख्यतः दो तरह से दिखाई देते हैं – आंतरिक परिवर्तन एवं बाह्य परिवर्तन। आंतरिक परिवर्तन मुख्य रूप से भाषा के स्तरों ध्वनि, रूप, शब्द एवं वाक्य पर दिखाई देता है, जबकि बाह्य परिवर्तन भौगोलिक, राजकिय, ऐतिहासीक, आर्थिक आदि स्तरों पर दिखाई देते हैं। प्रस्तुत आलेख में वर्हाडी बोली की वाक्यस्तरीय व्यवस्था पर प्रयुक्त हिंदी संरचना को स्पष्ट करने का प्रयास किया गया है।

    भाषा में वाक्य का एक विशिष्ट व्याकरणिक क्रम होता है, जिसके माध्यम से उस भाषा के वाक्य का पूर्ण अर्थ प्रकट किया जाता है। वर्हाडी बोली की वाक्यस्तरीय व्यवस्था देखे तो यह प्रमाण मराठी की तरह है। इस बोली के वाक्यों में प्रयुक्त शब्दों का क्रम कर्ता, कर्म एवं क्रिया के अनुसार प्रयुक्त होने पर भी कहीं-कहीं हिंदी का प्रभाव दिखाई देता है। इन वाक्यों में प्रयुक्त शब्दों का आपस में संबंध उसके स्थान एवं प्रत्यय से निश्चित होते हैं। प्रमाण मराठी की तरह वर्हाडी बोली में भी रचना एवं अर्थ के आधार पर वाक्य के प्रकार देखे जाते हैं। वर्हाडी बोली में प्रयुक्त इन वाक्यों की संरचना पर हिंदी संरचना का प्रभाव दिखाई देता है। यह प्रभाव मुख्यतः अर्थ के आधार पर प्रयुक्त वाक्यों की संरचना पर दिखाई देते हैं। अर्थ के आधार पर वर्हाडी बोली में वाक्य के प्रमुख रूप से पाँच प्रकार देखे जा सकते हैं – विधानार्थी वाक्य, नकारार्थी वाक्य, प्रश्नार्थी वाक्य, आज्ञार्थी वाक्य एवं विस्मयादीबोधक वाक्य। इन सभी वाक्य प्रकारों में से नकारार्थी वाक्य, एवं आज्ञार्थी वाक्य पर हिंदी संरचना का प्रभाव दिखाई देता है। इसे निम्न विवेचन एवं उदाहरणों के आधार पर समझा जा सकता है।

नकारार्थी वाक्य –

प्रमाण मराठी में क्रिया के बाद नकारार्थी रूपों का प्रयोग किया जाता है, लेकिन वर्हाडी बोली में नकारार्थी रूपों का प्रयोग क्रिया के पहले किया जाता है। वर्हाडी बोली में क्रिया के पहले नकारार्थी क्रियारूपों का प्रयोग हिंदी के प्रभाव के कारण ही दिखाई देते हैं। हिंदी में भी नकारार्थी रूपों का प्रयोग भी क्रिया के पहले किया जाता है। वर्हाडी बोली में वर्तमानकाल, भूतकाल एवं भविष्यकाल में नकारार्थी रूपों का प्रयोग क्रमशः नाय, नवती, नासिन के रूप किया जाता है। इन सभी नकारार्थी रूपों की संरचना पर दिखाई देनेवाले हिंदी प्रभाव को निम्न रूप से देखा जा सकता है।

  • मी येणार नाही [प्रमाण मराठी]
  • म्या नाय येत [वर्हाडी बोली]
  • मैं नहीं आऊँगा [हिंदी]

 

  • मुलगी आली नाही [प्रमाण मराठी]
  • पोट्टी नवती आली [वर्हाडी बोली]
  • लड़की नहीं आई [हिंदी]

 

  • तो आला नसेल [प्रमाण मराठी]
  • थ्यो नसलं/नसन् आला [वर्हाडी बोली]
  • वह नहीं आया [हिंदी]

 

  • त्याने मला बोलवले नाही [प्रमाण मराठी]
  • त्यानं मले नाय बोलवल् [वर्हाडी बोली]
  • उसने मुझे नहीं बुलाया [हिंदी]

 

  • त्याला काही समझत नाही [प्रमाण मराठी]
  • त्याले काय नाय समझत [वर्हाडी बोली]
  • उसे कुछ नहीं समझता [हिंदी]

    उक्त वाक्यों के आधार पर यह बात स्पष्ट हो जाती है कि, वर्हाडी बोली में हिंदी संरचना की तरह नकारार्थी क्रियारूपों का प्रयोग किया जाता है।

आज्ञार्थी वाक्य :-

    वाक्य के द्वारा किसी को आज्ञा, आदेश या उपदेश दिया जाए, उसे आज्ञार्थी वाक्य कहा जाता है। वर्हाडी बोली में आज्ञार्थी वाक्य क्रिया के स्वरूप के अनुसार प्रयुक्त होते हैं। वर्हाडी बोली में आज्ञार्थी रूपों में एकवचन में जो प्रत्यय एवं अनेकवचन में जा प्रत्यय का प्रयोग किया जाता है। जैसे – मायासाठी थांबजो, त्याले सांगजा, त्याकडुन पैसे घेजा आदि आज्ञार्थी वाक्यों के मूल क्रियाओं में इन प्रत्ययों का प्रयोग किया जाता है। प्रमाण मराठी में इस तरह की संरचना नहीं दिखाई देती। वर्हाडी बोली के कुछ आज्ञार्थी वाक्यों में द्विरुक्त क्रियाओं का प्रयोग दिखाई देता है। इन द्विरुक्त क्रियाओं का प्रयोग वर्हाडी बोली में हिंदी के द्विरुक्त क्रियाओं की तरह दिखाई देती हैं। हिंदी में भी आज्ञार्थी वाक्यों में द्विरुक्त क्रियाओं का प्रयोग किया जाता है। जैसे –

  • त्याला माहिती दे [प्रमाण मराठी]
  • त्याले मायती देवुन दे [वर्हाडी बोली]
  • उसे पूरी जानकारी दे दो [हिंदी]

 

  • पैसे घे [प्रमाण मराठी]
  • पैसे घेवुन घे [वर्हाडी बोली]
  • पैसे ले लो [हिंदी]

 

  • त्याकडे ध्यान ठेव [प्रमाण मराठी]
  • त्याकड़ ध्यान ठेवजा [वर्हाडी बोली]
  • उसपर ध्यान रख लो [हिंदी]

 

  • उद्या घरी ये [प्रमाण मराठी]
  • उद्या घरी येजा [वर्हाडी बोली]
  • कल घर आ जाओ [हिंदी]

 

  • पुस्तक घेऊन ये [प्रमाण मराठी]
  • पुस्तक घेवुन येजो [वर्हाडी बोली]
  • पुस्तक लेके आना [हिंदी]

    उक्त उदाहरणों से यह बात स्पष्ट हो जाती है कि, वर्हाडी बोली के आज्ञार्थी वाक्यों की संरचना पर हिंदी का प्रभाव द्विरुक्त क्रियाओं की संरचना पर दिखाई देता है। इसके अलावा वर्हाडी बोली में प्रयुक्त वर्तमानकालीन सहायक क्रिया एवं भूतकालीन सहायक क्रियाओं की   वाक्य संरचना पर भी हिंदी संरचना का प्रभाव दिखाई दिया। यह प्रभाव हिंदी रहा सहायक क्रिया के रूप में वर्हाडी बोली में दिखाई देता है। जैसे

वर्तमानकालीन सहायक क्रिया

  • मी काम करीत आहे [प्रमाण मराठी]
  • मि काम करून राहिलो [वर्हाडी बोली]
  • मैं काम कर रहा हूँ [हिंदी]

भूतकालीन सहायक क्रिया –

  • तो हसत होता [प्रमाण मराठी]
  • तो हसुन राहिला होता [वर्हाडी बोली]
  • वह हँस रहा था [हिंदी]

    इस तरह उक्त विवेचन एवं उदाहरणों के आधार पर यह बात स्पष्ट हो जाती है कि, वर्हाडी बोली की वाक्य व्यवस्था प्रमाण मराठी की तरह होने के बावजुद इस बोली की वाक्य संरचना पर कहीं-कहीं हिंदी संरचना का प्रभाव दिखाई देता है।

संदर्भ ग्रंथ

  • नाफडे शोभा.(2007).वर्हाडी मराठी: उद्गम एवं विकास. औरंगाबाद : स्वरूप प्रकाशन.
  • वर्हाडपांडे वसंतकुमार.(1972).नागपूरी बोली: भाषाशास्त्रीय अभ्यास. नागपूर: इंदिरा प्रकाशन  
  • देशमुख अंबादास.(1990).हिंदी और मराठी की व्याकरणिक कोटियाँ. कानपुर : अतुल प्रकाशन.
  • गुरु कामताप्रसाद.(2010). हिंदी व्याकरण. इलाहाबाद : लोकभारती प्रकाशन.
  • भोलानाथ तिवारी.(2010). भाषाविज्ञान. इलाहाबाद: किताब महल
  • Pandharipande Rajeshwari. (1997). Marathi. Londan : New Fetter Lane.
  • Dhongde Ramesh and Wali Kashi [1984] Marathi .Amsterdam\Philadelphia : Benjaming Publishing Company.

 


विजय सागर : लेखक पुणे विश्वविद्यालय के शोध छात्र हैं। संपर्क: vijays3101@gmail.com

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