ISSN : 2231-4989

भाषा अनुरक्षण एवं विस्थापन : एक मूल्यांकन - सुमेधा शुक्ला

जब कोई भाषा अपने समस्त व्यवहार संपादित करने में समर्थ नहीं होती है और परिणामतः उसके स्थान पर कोई दूसरी भाषा कुछ क्षेत्रों में कार्य व्यवहार के लिए प्रयुक्त होने लगती है, तो इस स्थिति को भाषा परिवृत्ति की संज्ञा देते हैं। प्रायः देखा जाता है कि कुछ पीढ़ियों में वहाँ के विस्थापितों में अन्य भाषा मातृभाषा का स्थान गृहण कर लेती है। विस्थापितों की मातृभाषा लुप्त होने का कारण यह है कि वे लोग अन्य भाषा के प्रति सांस्कृतिक, शैक्षिक, आर्थिक, आदि कारणों से आकर्षित होकर उस अन्य भाषा के तत्वों को अपनी भाषा में स्थान दे देते हैं, और धीरे-धीरे वह अन्य भाषा उनकी मातृभाषा के सामान्तर आ कर खड़ी हो जाती है। अर्थात् पहली पीढ़ी अपनी भाषा का अनुरक्षण करती है और दूसरी पीढ़ी के वक्ताओं में मध्य की स्थिति प्राप्त होती है एवं तीसरी पीढ़ी तक आते-आते अन्य भाषा का प्रयोग इतना अधिक बढ़ जाता है कि मातृभाषा लगभग पीछे छूटती सी दिखाई पड़ती है, तथा शनै-शनै मातृभाषा का प्रयोग केवल मौखिक व्यवहार तक सीमित रह जाता है। प्रश्न यह उठता है कि भाषा विस्थापन की स्थिति क्यों उत्पन्न होती है? और क्या कारण हैं कि कुछ भाषाएँ अपने अस्तित्व को बनाए रखने में सफल नहीं हो पाती हैं।

यह सर्वमान्य तथ्य है कि जब एक भाषा-भाषी समुदाय किसी दूसरे भाषाई समाज के संपर्क में आता है तब उनकी भाषाएँ परिवर्तित हुए बिना नहीं रहती हैं और इसी स्थिति में सामाजिक,सांस्कृतिक, शैक्षिक, आर्थिक, दृष्टि से समृद्ध भाषा दूसरी भाषा को प्रभावित करती है। इस प्रक्रिया में सर्वप्रथम भाषा के शब्द प्रभावित होते हैं जिन्हे हम भाषा परिवर्तन की परिधि में रखते हैं। संपर्क की स्थिति में प्रायः एक भाषा दूसरी भाषा से सीधे शब्द ही गृहण करती है और हम बिना प्रत्यक्ष ध्वनि परिवर्तन के इन शब्दों को अपनी भाषा में स्थान देते हैं- अंग्रेजी भाषा के license, notice, petrol आदि शब्दों में हम ध्वनि परिवर्तन नहीं पाते हैं इन शब्दों को हिन्दी भाषा ने यथावत ग्रहण कर लिया है। दूसरी स्थिति वह दृष्टिगत होती है जब वक्ता दूसरी भाषा के शब्दों को ध्वनि रूपान्तरण के साथ स्वीकार करता है- आज हिन्दी में academy के लिए अकादमी, और technique के लिए तकनीक शब्द व्यवहृरत हो रहा है। वर्तमान हिन्दी में बहुत से शब्द हैं जिन्हें हम रूपान्तरित कर प्रयोग में ला रहे हैं। इसके विपरीत ऐसा भी होता है कि हमारी भाषा में पहले से ही कोई शब्द उपस्थित रहता है फिर भी हम दूसरी भाषा से प्रभावित होकर उस भाषा के शब्द के अनूदित रूप को भी उतनी ही महत्तता देने लगते हैं- लकड़ी में लगने वाले कीड़े के लिए हिंदी भाषा में दीमक शब्द बहुत पहले से प्रयोग में आ रहा है परन्तु अंग्रेजी भाषा में इसके लिए white ant शब्द प्रचलित है आज जिसके अनुवाद द्वारा निर्मित एक नया शब्द सफेद चींटी भी हिन्दी में प्रचलित हो गया है जो हिन्दी शब्द दीमक के समानान्तर रूप में ही प्रयोग किया जाता है। परिवर्तन की इस प्रक्रिया से शब्द के पश्चात धीरे-धीरे भाषा संरचना के अन्य स्तर जैसे व्याकरण आदि भी प्रभावित होने लगते हैं और एक समय ऐसा आता है जब भाषा अपना स्वरूप खोने लगती है तथा विस्थापित रूप में प्रयुक्त होने लगती है यहीं से विस्थापन की स्थिति उत्पन्न हो जाती है इसके वपरीत यदि कोई भाषा अन्य भाषा से प्रभावित नहीं होती है एवं उसमें किसी प्रकार का परिवर्तन घटित नहीं होता है तब उस स्थिति में भी परिवर्तन के अभाव में उसका कार्य व्यवहार सीमित हो जाता है तथा भाषा शनै-शनै स्थिर होते हुए मृत हो जाती है क्योंकि कोई भी भाषा अपने परिवर्तनशील रूप में ही जीवंत रहती है, किन्तु यह बहुत आवश्यक है परिवर्तन किसी भी भाषा की शब्द, व्याकरण, ध्वनि व संरचना को इतना अधिक प्रभावित न करे कि वह भाषा विस्थापन की ओर अग्रसर होने लगे। ब्लूमफील्ड इसीलिए अमेरिका की अंग्रेजी को देशी भाषा नहीं दत्तक भाषा कहते हैं। भाषा अनुरक्षण क्यों होता है इस बात से अमेरिकी समाजशास्त्री अपनी जिज्ञासा शुरु करते हैं जबकि भारतीय समाजशास्त्रीय इस बात से अपना अध्ययन शुरु करते हैं कि लोग अपनी भाषा क्यों त्याग देते हैं। वेनरिख ने भाषा परिवृत्ति के संबंध में कुछ मौलिक प्रश्न भी उठाए हैं-

· क्या भाषा परिवृत्ति और भाषा व्याघात एक ही दिशा में होते हैं? अथवा क्या परिवर्तन में कमी से भाषा व्याघात में कमी आती है या फिर इनसे इतर एक तीसरी भाषा का जन्म होता है।

· क्या भाषा व्याघात इस सीमा तक बढ़ सकता है कि उसका परिणाम भाषा परिवृत्ति हो जैसे- क्या किसी दुभाषी द्वारा बोले गए वक्तव्य की भाषा ‘क’ किसी दूसरी भाषा ‘ख’ से इतनी प्रभावित हो सकती है कि दोनो में कोई अंतर न रह जाए?

· क्या किसी वाक्य के वाक्यांश को बोलते समय भाषा में आदतवश जो अंतरण आता है, वह एक भाषा से दूसरी भाषा के विस्थापन को दिखाता है?

भाषा अनुरक्षण और विस्थापन का प्रश्न तब उठता है जब दो अलग तरह के लोग एक दूसरे के साथ संपर्क स्थापित करते हैं । संपर्क की स्थिति में द्विभाषिकता का महत्व बढ़ने लगता है जो कई पीढ़ियों तक चलता है। भाषा परिवृत्ति तब पायी जाती है जब एक भाषा पूरीतरह दूसरी भाषा के महत्व को छोड़ देती है। भारत में तमिलनाडु के तन्जावुर जिले में ऐसी स्थिति देखी जा सकती है जहाँ 400 साल से तमिल और तेलगु दोनो भाषाओं का समान महत्व रहा है, किन्तु वर्तमान समय में तमिल भाषा पूरी तरह तेलगु भाषा में बदल गई है। परिवृत्ति के दो प्रकार भी सामने आते हैं पूर्ण एवं आंशिक परिवृत्ति।

जब एक भाषा के स्थान पर दूसरी भाषा का प्रयोग भाषा व्यवहार के सभी प्रयोगगत संदर्भों में प्रारंभ हो जाए तब यह स्थिति पूर्ण परिवृत्ति की परिचायक होती है, उदाहरणार्थ अमेरिकी यहूदी लोग वहाँ के समाज में पूर्णतः समीकृत हो गए हैं।

आंशिक स्थिति से तात्पर्य उस स्थिति से होता है जब एक भाषा के स्थान पर दूसरी भाषा का प्रयोग तो होता है परंतु केवल सीमित संदर्भों में, जैसे- पश्चिमी पंजाब और उत्तर-पश्चिम सीमांत प्रांत में बोली जाने वाली लहंदा भाषा का प्रयोग बोलचाल के स्तर पर होता है इसके विपरीत पत्र व्यवहार आदि औपचारिक स्थितियों में लहंदा के स्थान पर हिंदी, पंजाबी व कभी-कभी अंग्रेजी का प्रयोग होता है अतः कह सकते हैं कि लहंदा भाषा के विस्थापन की दिशा हिंदी व पंजाबी भाषा की ओर अग्रसर हो रही है। भाषा और अस्मिता एक दूसरे के अभिन्न अंग है अस्मिता एक सामाजिक प्रश्न है यह भाषा के सामाजिक स्तर से गहराई से जुड़ी रहती है। वह भाषा जो शिशु को प्रथमतः अपने माता पिता द्वारा सिखाई जाती है, या फिर जो भाषा शिशु अपने माता पिता को सुनकर स्वतः ही सीखता है वही उसकी मातृभाषा कहलाती है फिर चाहे उस व्यक्ति को उस भाषा का अधूरा या मौखिक ज्ञान ही क्यूं न हो। उसका अधूरा ज्ञान या सिर्फ मौखिक ज्ञान भी यह कहने के लिए पर्याप्त होता है कि वह हमारी मातृभाषा है। भाषाविदों के अनुसार भाषा ही व्यक्ति का उसकी संस्कृति से प्रथम परिचय कराती है और उसे एक अस्मिता प्रदान करती है। लखनऊ के संदर्भ में जहाँ 62% सूचकों की मातृभाषा हिन्दी है वहीं 12% सूचक उर्दू व 26% सूचक अन्य भाषा के मिलते हैं। एक आश्चर्यजनक तथ्य सामने आया है कि मुस्लिम धर्म के बहुत से लोगो ने अपनी मातृभाषा उर्दू नहीं हिन्दी बताया है।

 

हिन्दी  62 %
उर्दू 12 %
बिहारी 9 %
बंगाली 8 %
पंजाबी 9 %

इसके अतिरिक्त 58%लोग हिंदी भाषा समझते एवं बोलते है, जबकि 32 % लोग अंग्रेजी भाषा को भी समझते एवं बोलते हैं और 10% लोग ऐसे हैं हिन्दी एवं अंग्रेजी के अलावा अन्यभाषा भी बोलते एवं समझते है। यह पूछने पर कि वे उच्च शिक्षा हिन्दी भाषा में पूरी करना चाहेंगे या अंग्रेजी भाषा में जिसमें 65% लोगों ने अंग्रेजी भाषा को उच्च शिक्षा के लिए अनिवार्य बताया 35 % सूचक हिन्दी माध्यम से अपनी शिक्षा पूरी करना चाहते हैं।

उच्च शिक्षा
हिन्दी 35% 
अँग्रेजी 65%

लखनऊ में हिन्दी उर्दू के अतिरिक्त अंग्रेजी भाषा ने शिक्षा, वार्तालाप, एवं अन्य क्षेत्रों में अपनी पैठ बना ली है। यहाँ विवाह के कार्ड छापने में भी कुछ लोग हिन्दी व अंग्रेजी दोनो भाषाओं को वरीयता देने लगे हैं। इससे क्या यह कह सकते हैं कि लखनऊ की हिन्दी भाषा अंग्रेजीकरण से प्रभावित हो रही है? इसके संकुचित हो रहे व्यवहार क्षेत्र क्या चिंता का कारण हैं? या इसका मिश्रित रूप इसे उन्नति की ओर ले जा रहा है। हिन्दी का यह मिश्रित रूप किताबी हिन्दी से भिन्न है और उसमें बोलचाल के अंग्रेजी शब्दों का वही अस्तित्व है जैसा अंग्रेजी में ग्रीक, लैटिन के शब्दों का है। विस्थापन जहाँ आर्थिक आवश्यकता के कारण उत्पन्न सामाजिक एकता को बढ़ावा देता है वहीं भाषा अनुरक्षण भाषा की अस्मिता को बनाए रखने का प्रयास है। समाज में दोनो तरह की स्थितियाँ देखने को मिलती हैं, जहाँ एकतरफ भाषिक समुदायों का विस्थापन पाया जाता है वहीं अस्मिता और अनुरक्षण के प्रति लगाव भी देखने को मिलता है। विभिन्न सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक दबावों के बावजूद अपनी भाषा को बनाए रखने का प्रयास करना अर्थात् जब कोई समुदाय दूसरे समुदायों के साथ निरंतर रहने के उपरांत भी अपनी भाषा को नहीं छोड़ता और सभी प्रकार के सामाजिक एवं मनोवैज्ञानिक दबावों का सामना करते हुए अपनी भाषा को सुरक्षित रखता है तो इस स्थिति को हम अनुरक्षण की संज्ञा देते है। अनुरक्षण के प्रति किसी भाषिक समुदाय का अपनी भाषा के प्रति भावात्मक लगाव, निष्ठा व उसकी अस्मिता के प्रति सचेतता कार्य करती है। प्रायः भाषिक समुदायों में परिवर्तन और अनुरक्षण की स्थितियाँ साथ- साथ घटित होती हैं। एक अल्पसंख्यक समुदाय जहाँ अनेक क्षेत्रों में प्रभावी भाषा का प्रयोग करता है, वहीं अन्य क्षेत्रों में अपनी भाषा को अनुरक्षित रखता है अथवा किसी मिश्रित कोड का प्रयोग करता है। कभी-कभी संपूर्ण समीकृत स्थिति में भी वक्ता अपने अंतरंग समूह में (अनौपचारिक स्थितियों में) मिश्रित रूपों का प्रयोग कर कुछ सीमा तक मातृभाषा अनुरक्षण करता है । भाषा एक गतिशील उपादान है जिसमें निरंतर परिवर्तन होते रहते हैं परन्तु इस बात का पूरा ध्यान रखना चाहिए कि गतिशीलता कहीं मानकीकरण को प्रभावित न कर दे। किसी भी भाषा का अस्तित्व इस बात के आधार पर निर्भर करता है कि उस समुदाय के व्यक्तियों का अपनी भाषा के प्रति कितना लगाव है। जब हम अपनी भाषा के प्रति लापरवाह हो जाते हैं एवं अपनी भाषा के प्रति अपने स्नेह को त्याग देते हैं तब ही हमारी भाषा का अस्तित्व संकट में पड़ जाता है। अतः यह कह सकते हैं कि व्यक्तियों का अपनी भाषा के प्रति हीन भावना रखना, नकारात्मक मनोभाव रखना, उसके प्रति उदासीन रहना, व आधुनिकता की होड़ में अपनी भाषा के प्रति कम रुचि रखना एवं अन्य भाषा के प्रयोग के प्रति श्रेष्ठ भाव रखना आदि भाषा के अस्तित्व ह्रास के कारण कहे जा सकते हैं। और ऐसे में भाषा के प्रयोग क्षेत्र घट जाते हैं व उसके प्रयोगकर्ताओं की संख्याँ में कमी आ जाती है।

संदर्भ सूची-

शर्मा श्रीकृष्ण, 1986, भाषा अनुरक्षण और विस्थापन केंद्रीय हिंदी संस्थान आगरा।

भाषा पत्रिका, 2000, सितम्बर-अक्टूबर, आधुनिक भाषिक परिवेश में बहुभाषावाद।

David Crystal, 2000 Language death Cambridge University Press.

D.P.Pattanayak 1990, multilingualism in India

Weinreich,Uriel 1953 Language in Contact, The Hahne Mouton.

Gal,Susan 1979, Language Shift:- Social determinates of Linguistics change in Bilingual Austria Newyork Academy Press.

Goswami K.K. 1994, Code switching in Lahanda Speech Community, Kaling publication Delhi


सुमेधा शुक्ला : लेखिका लखनऊ विश्वविद्यालय की शोधार्थी रहीं हैं और फिलहाल वहीं भाषाविज्ञान विभाग से जुड़ी हैं। संपर्क: sumedhashukla7@gmail.com

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