ISSN : 2231-4989

बुन्देली और हिन्दी का औच्चारणिक व्यतिरेकी अध्ययन - अंकिता आचार्य

किसी भी भाषा की स्वनिमिक व्यवस्था उसका मूल आधार होती है। अतः भाषा के किसी भी प्रकार के अध्ययन के लिए उस भाषा का स्वनिमिक विश्लेषण व अध्ययन अत्यन्त महत्वपूर्ण होता है। प्रकृत भाषा संसाधन (natural language processing) के सन्दर्भ में यह अध्ययन और भी अधिक प्रासंगिक है। स्वनिमिक अध्ययन के आधार पर ही हम उस भाषा की विभिन्न बोलियों के भेद-प्रभेद अथवा अन्य भाषाओं से उसका अंतर तथा उस भाषा पर अन्य भाषाओं के प्रभाव का मूल्यांकन कर सकते हैं।

बुन्देलखण्ड में बोली जाने वाली भाषा बुन्देली है। संस्कृत भाषा के विद्रोह स्वरूप प्राकृत एवं अपभ्रंश भाषाओं का विकास हुआ, इनमें देशज शब्दों की बहुलता हुई। शौरसेनी अपभ्रंश से उद्भुत बुन्देली मध्य प्रदेश की जन भाषा है। “आदर्श बुन्देली” जालौन, बाँदा, हमीरपुर, झाँसी, सागर, ललितपुर, ग्वालियर, भोपाल, सिवनी, ओरछा, नरसिंहपुर, होशंगाबाद तथा दतिया आदि जिलों में बोली जाती है। मध्यप्रदेश के बाकी जिलों में बोली जाने वाली बुन्देली मिश्रित बुन्देली या बुन्देली की उपबोलियाँ हैं, जिन्हें वहाँ की क्षेत्रीय भाषा कहा जाता है।

बुन्देली की बोलियाँ :-- बुन्देली की तीन बोलियाँ प्रमुख हैं।

1) पँवारी - ग्वालियर के उत्तर-पूरब दतिया तथा उसके आसपास के इलाके में बोली जाती है।

2) लोधान्ती अथवा राठौरी - हमीरपुर के राठ क्षेत्र में तथा जालौन के निकटवर्ती क्षेत्रों में बोली जाती है।

3) खटोला - यह बोली दमोह जिले तथा दक्षिण-पूर्वी भागों के भाषिक-व्यवहार में प्रयुक्त होती है।

नर्मदा के दक्षिण में बैतूल, सिवनी और छिंदवाड़ा तक बोली जाने वाली बुन्देली पर मराठी का प्रभाव है। उत्तर में ब्रज और कन्नौजी, पूर्वी क्षेत्र में अवधी, बघेली और छत्तीसगढ़ी तथा पश्चिम में मालवी और निमाड़ी का प्रभाव साफ झलकता है। आदर्श बुन्देली या ठेठ बुन्देली के शब्द हिन्दी से भिन्न हैं। जैसे-- भुंसारे-सुबह, संकारे-सबेरे, बटाठाई- आवारा या बिना काम के, दांद-उमस, घांई- जैसा आदि।

प्रस्तुत शोध-आलेख में बुन्देली भाषा का स्वनिमिक अध्ययन करने के लिए prosodic features, syllabic pattern का विशेष अध्ययन किया गया है। बुन्देली की अपनी कुछ ऐसी स्वनिमिक विशेषताऐं हैं जो उसे हिन्दी से अलग करती हैं---

  1. बुन्देली में 10 स्वर तथा 27 व्यन्जन हैं। बुन्देली में हिन्दी के ऋ, अः, ञ, ष, श, क्ष, त्र, ज्ञ, ण नहीं हैं।
  2. बुन्देली में हिन्दी की अपेक्षा स्वरों का उच्चारण अतिदीर्घ रूप में किया जाता है।
  3. बुन्देली भाषा व्यवहार (उच्चारण) में महाप्राण ध्वनियों का प्रयोग अधिक होता है। जैसे- करत्तो > करत्थो, चाहत्ती > चाहत्थी, हतै > हथै आदि।
  4. बुन्देली संयुक्ताक्षर बहुल एवं संश्लिष्ट प्रकृति की भाषा है— इतने > इत्ते, कर लिया > कल्लई, अभी > अब्बई, उन्होंने > बिन्ने, जिस ने > जिन्ने, किस ने > कोन्ने, खोल लिया > खोल्लई, लगता था > लगत्तो आदि। अतः उच्चारण में बहुत अंतर देखने को मिलता है।
  5. बुन्देली में “व” एवं “य” अर्ध स्वरों का प्रयोग शब्दों के प्रारंभ में नहीं होता। “व” के स्थान पर “ब” का प्रयोग होता है-भगवान > भगबान, पकवान > पकबान, विचार > बिचार आदि। “य” का प्रयोग शब्दों के मध्य या अंत में होने पर पूर्ण स्वर का रूप ले लेता है जैसे- पायल > पाइल, नया > नओ, गया > गऔ आदि। इसी प्रकार शब्द के प्रारंभ में आने पर “य” के स्थान पर “ज” का प्रयोग होता है जैसे- यजमान > जजमान, यमुना > जमुना आदि।
  6. बुन्देली मुखर बोली है अर्थात् बुन्देली की ध्वनियाँ उच्च (peak) हैं। व्यंजन की तुलना में स्वर अधिक मुखर होते हैं, बुन्देली के शब्दों में दीर्घ स्वर लगाकर ध्वनि का मुखर उच्चारण किया जाता है। कोऊखों, चाउत, गओ, खालौ, हतो, अजाहैं आदि।

आक्षरिक संरचना ( syllabic pattern )— किसी भी भाषा को समझने के लिए उस भाषा की आक्षरिक संरचना का अध्ययन मददगार साबित होता है क्योंकि अक्षर मातृभाषी (native speaker) के एक वक्षस्पंद में उच्चरित होने वाली एक इकाई है। आक्षरिक संरचना के अध्ययन द्वारा भाषिक संरचना तथा अर्थ समझने में सहायता मिलती है।

बुन्देली मुखर भाषा है अतः प्रत्येक शब्द में कुछ ध्वनियाँ उच्च(peak) तथा कुछ निम्न या गर्त (valley) होती हैं। एक शब्द में जितने उच्च स्वर होंगे ध्वनि उतनी ही मुखर होगी। बुन्देली की आक्षरिक संरचना का विश्लेषण इस प्रकार है—

1. एक आक्षरिक (mono syllabic)

ई / i: / { v } = इस

ऊ / u: / { v } = वह झैं / ʤh͠æ/ { cv } = यहीं

हौ / h᧑ / { cv } = ठीक है

का / ka: / { cv } = क्या

गौ / g᧑ / { cv } = गया

2. द्विआक्षरिक (disyllabic)

इतैं / ɪtẽ / {vcv} = इधर

कओ / kəo / { cvv } = किया

उतैं / ʊtẽ / {vcv} = वहीं

रए / rəe / { cvv } = रहे

सुई / sʊi: / {cvv} = भी घांई / ghã:i: / {cvv} = जैसा

बेऊ / beu: / {cvv} = वोभी

दोई / doi: / {cvv} = दोनो

3. त्रिआक्षरिक (trisyllabic)

मइना / məɪna: / {cvvcv} = महिना

कइयो / kəɪjo / {cvvcv} = कहना

नईयां / nəi:jã: / {cvvcv} = नही है

करबो / kərəbo/ { cvcvcv} = करना

कभऊं / kəbhəũ: / {cvcvv} = कभी

4. चतुराक्षरिक (tetrasyllabic)

उनईखों / ʊnəi:khõ / {vcvvcv} = उनको

अढ़तिया / əḍhətɪja: / {vcvcvcv} = थोक व्यापारी

टरकाउत / ṭərəka:ʊt / {cvcvcvvc} = टालना

कानाफूंसी / ka:na:phũsi:/ {cvcvcvcv} = कान में कुछ कहना

इत्तियई / ɪttɪjəi: / {vccvcvv} = इतनी

5. पंचाक्षरिक (penta syllabic)

आखिरकारा / a:khɪrəka:ra: / {vcvcvcvcv} = आखिरकार

निकरतई / nɪkərətəi: / {cvcvcvcvv} = निकलना

अकबकाई/ əkəbəka:i: / {vcvcvcvv} = बैचेनी

पिरसासन/ pɪrəsa:sən / {cvcvcvcvcv} = प्रशासन

संयुक्ताक्षर (Clusters) – बुन्देली भाषा में मुखरता होने के बावजूद इसमें संयुक्ताक्षर भी पाए गए हैं। जो लोग शिक्षित हैं वे संयुक्ताक्षर का उच्चारण ठीक-ठीक कर लेते हैं पर जो अशिक्षित या पूर्णतः ग्रामीण लोग हैं वे स्पष्ट नहीं बोल पाते। जैसे- स्टेशन > टेशन, प्रतियोगिता > परतियोगिता, प्रभाव > पिरभाओ, प्रशासन > पिरसासन, परिक्रमा > परकम्मा आदि।

बुन्देली में शुरुआती (Initial) संयुक्ताक्षरों का प्रयोग नहीं होता एक दो शब्दों को छोड़कर सभी शुरुआती (Initial) संयुक्ताक्षर इस प्रकार बोले जाते हैं-

बुन्देली हिन्दी

परेम / pərem / प्रेम भरम / bhərəm / भ्रम

का / ka: / क्या छमा / ʧhəma: / क्षमा

जुआंर / ʤʊã:r / ज्वार टरेन / ţəren / ट्रेन

कलेस / kəles / क्लेश पियाज / pɪja:ʤ / प्याज

संयुक्त स्वर ( vowel cluster)

सुई / sʊi׃ / = भी,

आउत / a:ʊt / = आया,

हुई / hʊi׃ / = होगा

संयुक्त व्यन्जन ( consonant cluster)

1. Initial cluster

बुन्देली में आरंभिक स्तर पर संयुक्ताक्षरों का प्रयोग नहीं होता है किन्तु हिन्दी के प्रभाव स्वरूप इनका प्रयोग भी दिखलायी पड़ता है।

न्याय / njaj / = इंसाफ

द्वार / dwa:r / = दरवाजा

2. Medial cluster

लग्गई / ləggəi׃ / = लगी कर्रै / kərre / = कर रहे

कल्लओ / kəlləo / = कर लिया होज्जेहै / hoʤʤehe / = होता जाएगा

मुर्हा / mʊrha: / =लड़का

मुर्हौ / mʊrh᧑ /=लड़की

3. Final cluster

गुट्ट / gʊṭṭ /= समूह, चाहत्थी / ʧa:hətthi׃ / = चाहती थी,

इकट्ठो /ɪkəṭṭho / = एकत्रित, टुग्ग / ṭʊgg / = टोक,

परकम्मा / pərəkəmma:/ = परिक्रमा, केत्ते / kette / = कहते थे

छत्ता / ʧhətta: / = छाता

हिन्दी के संयुक्ताक्षर बुन्देली में असंयुक्त रूप में उच्चरित किए जाते हैं --

हिन्दी बुन्देली

पत्थर /pətthər / > पथरा /pəthra:/

स्मिता /smɪta:/ > सिमता /sɪməta:/

 

नासिक्य ध्वनियाँ (N asal sounds ) --

बुन्देली भाषा में नासिक्य वर्णों का प्रयोग अधिक किया जाता है—ऊखौं, जैहों, करहों, खालेने, देखहों, आहौं, खाँड़, ऊंसई, पोंच, भुंसारे, नइंयां आदि। जहां हिन्दी में अं, ङ, ञ, ण, म, न, नासिक्य वर्णों का प्रयोग किया जाता है, तथा एक शब्द में लगभ एक नासिक्य वर्ण आता है जैसे दोनो, तुम, हम, नहीं, वहीं आदि। वहीं बुन्देली में केवल म, न, अं का प्रयोग किया जाता है और सबसे अधिक अं का प्रयोग होता है। बुन्देली में एक शब्द में एक या एक से अधिक नासिक्य वर्ण भी आ सकते हैं जैसै देंहें, लिंगां, अजांहें, आदि बुन्देली में नासिक्य वर्ण शब्द के आरंभ, मध्य, और अंत तीनों स्थानों पर आते हैं। बुन्देली में सर्वाधिक प्रयुक्त होने वाले नासिक्य शब्द इस प्रकार हैं—

1. Initial nasal

ऊंसई / ũ׃səi׃ / = वैसेही

लिंगा / lĩga: / = जगह(स्थान)

झैं / ʤhẽ / = यहाँ

संजा / səʤa: / = शाम

ऐंसो / ẽso / = ऐसा

2. Medial nasal

पछांरू / pəʧhã:ru׃/ = पीछे

पोंच / pÕʧ / = पहुँच

1. Final nasal

लुकायें / lʊka:jẽ/ छुपाना

अजाहें / əʤa:hẽ / = आजाना

कायखों / ka:jəkhÕ/ = क्यों

देखकें /dekhəkẽ/ = देखना

अतः हम बुन्देली व हिन्दी के आक्षरिक एवं औच्चारणिक व्यतिरेक को स्वनिमिक विशलेषण से अच्छी तरह समझ सकते हैं।

Sample Text in Bundeli :-

एक राज को राजा भौतै नोनों हतो (उच्चारण- हथो), दयावान गुनी न्यायप्रिय। रैयत सोई ऊखों खूब चाहतती (उच्चारण- चाहत्थी) काये कें बो सबको भलो करत्तो (उच्चारण- करत्थो)। सबरे राज में अमन चैन हतो (उच्चारण-हथो)। पनो एक बात तनक गड़्बड़ हती(उच्चारण-हथी) के बा राजा के कान भौत बड्डे-बड्डे हते (उच्चारण- हथै)। बो अपने कान पगड़ी में लुकायें रेत तो (उच्चारण-थो)। जा बात कोऊखों ने पता हती(उच्चारण-हथी)। रानी तक ने जानततीं (उच्चारण-जानत्थीं), हां राजा को जोन नाऊ हतो(उच्चारण-हथो) ऊ भर जानततो (उच्चारण-जानत्थो) काये कें ऊ तो राजा के बार बनाउततो (उच्चारण-बनाउत्थो) और बासे जा बात राजा छिपा सोई ने सकत तो(उच्चारण-थो)। मनो भईया राजा ने ऊखों सुद्ध बुंदेली में समझा दओ थो के जा बात कोऊखों पता ने लगे नईं तो तुमें हम फाँसी पे टँगा देहें। नाऊ कायेखों कोऊ से कैतो बाहे फाँसी थोड़ी चड़ने हती(उच्चारण-हथी)। मईना-पंदरा दिन ऊ आउततो(उच्चारण-आउत्थो) और बार बनाके चलो जात तो(उच्चारण-थो)।

 

Translation in Hindi :-

एक राज्य का राजा बहुत ही अच्छा था, दयावान, गुनी न्यायप्रिय। प्रजा इसीलिए उसको खूब चाहती थी क्योंकि वो सबका भला करता था। पर एक बात थोड़ी गड़बड़ थी कि उस राजा के कान बहुत बड़े-बड़े थे। वह अपने कान पगड़ी में छुपाए रहता था। यह बात किसीको नहीं पता थी। रानी तक नहीं जानती थीं, हाँ राजा का जो नाई था बस वह जानता था क्योंकि वह तो राजा के बाल बनाता था और इसीलिए राजा उससे यह बात छुपा नहीं सकता था। पर भइया राजा ने उसको शुद्ध हिन्दी में समझा दिया था कि यह बात किसीको पता न चले नहीं तो हम तुम्हें फाँसी पर टँगवा देंगे। नाई क्यों किसी से कहता उसे फाँसी थोड़े ही चढ़ना था। महीना-पन्द्रह दिन में वह आता था और बाल बना के चला जाता था।

सन्दर्भ सूची

  1. हिन्दी भाषा का उद्गम और विकास – डॉ. उदय नारायण तिवारी
  2. बुन्देली का भाषा शास्त्रीय अध्ययन – रामेश्वर प्रसाद अग्रवाल
  3. हिन्दी भाषा – महावीर प्रसाद द्विवेदी
  4. A Linguistic Study of Bundeli – Mahesh Prasad Jaisawal
  5. भाषा चिन्तन के नए आयाम – डॉ. रामकिशोर शर्मा
  6. हिन्दी और भारतीय भाषाएँ – भोलानाथ तिवारी, कमल सिंह
  7. भारतीय आर्य भाषाएँ – डॉ. उदय नारायण तिवारी
  8. सामान्य भाषाविज्ञान – वेश्ना नारंग
  9. आधुनिक भाषाविज्ञान – भोलानाथ तिवारी

अंकिता आचार्य पाठक : लेखिका लखनऊ विश्वविद्यालय, लखनऊ की शोधार्थी हैं। संपर्क: missacharya.bhu@gmail.com

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