ISSN : 2231-4989

कोश : इतिहास एवं वर्तमान - बृजेश कुमार यादव

कोश की आवश्यकता प्रत्येक पढ़े-लिखे व्यक्ति को प्राय: होती है, छात्र, शोधार्थी, शिक्षक, लेखक आदि ऐसा वर्ग है, जिसके पास कोश का होना अपेक्षित है। अतः कोश के महत्त्व से इनकार नहीं किया जा सकता है। यद्यपि कोश अलग-अलग उद्देश्यों के आधार पर कई प्रकार के होते हैं, जिनका निर्धारण कोशकार को निर्माण से पूर्व ही करना पड़ता है। शब्दों के अर्थों की प्रामाणिकता के लिए कोश को आधार-ग्रंथ भी कहा जाता है।

कोशविज्ञान भाषा में शब्दों या लेक्सिस का अध्ययन है तथा इसके निर्माण का ही प्रतिफल कोश है। कोश एक ऐसा संदर्भ-ग्रंथ होता है, जिसमें शब्दों तथा वाक्यांशों आदि के बहुअर्थक शब्दों का अर्थ-निर्धारण करता है। कोश प्राचीन नाम ‘कोष’ है जिसका तात्पर्य द्रव्य-संग्रहण से था, किंतु आगे चलकर इसका इतना विस्तार हुआ कि यही कोष शब्दकोश हो गया, जिसका अर्थ शब्दकोश या शब्द-संग्रहण से है। दोनों का भाव ‘संग्रहण’ से ही है। प्रथम का ‘द्रव्य’ संग्रहण से तो द्वितीय का ‘शब्द’ संग्रहण से है।

कोश के अध्ययन के विज्ञान को कोशविज्ञान (Lexicology) कहते हैं, जो भाषाविज्ञान का एक अनुप्रयुक्त क्षेत्र है। कोशविज्ञान के व्यावहारिक पक्ष को कोश-निर्माण-प्रक्रिया (Lexicography) कहा गया है। दोनों ग्रीक भाषा से निर्मित हैं जिसका अर्थ होता शब्द (Lexico=word) तथा लाजी (logy) जो कि लोगस (logous) से बना है, जिसका अर्थ है विज्ञान अर्थात् शब्द-विज्ञान। इसका तीसरा शब्द है ग्राफी (graphy) जिसका अर्थ होता है लिखना या निर्माण करना। इस आधार पर यह कहा जा सकता है कि कोशविज्ञान भी रूपविज्ञान की तरह शब्दों के आस-पास ही चक्कर कटता है। निःसंदेह यह कहा जा सकता है कि कोशविज्ञान भाषाविज्ञान के रूपविज्ञान (morphology) प्रारंभ होकर कोशनिर्माण प्रक्रिया तक का सफर तय कर चुका है तथा कोशनिर्माण कार्य में लगा हुआ है। कोश का अर्थ होता है शब्दों के विभिन्न अर्थों रूपों व उनके शुद्ध प्रयोग करने का एक पुख्ता आधार ग्रंथ। कभी-कभी अर्थों की सजीवता बनाए रखने के लिए चित्रों आदि का भी प्रयोग किया जाता है। कोश को विभिन्न विद्वानों ने तरह-तरह से परिभाषित भी किया है, जिसमें ऑक्सफोर्ड एडवांस्ड लर्नर्स डिक्शनरी के अनुसार ‘A book that gives a list of the words of a language in alphabetical order and explain what they mean.’ सी.सी. बर्ग की एक प्रसिद्ध परिभाषा इस प्रकार से है- ‘कोश उन सामाजिकृत भाषा रूपों की व्यवस्थित रूप से क्रमबद्ध सूची है जो भाषावैज्ञानिक पद्धति का अनुशरण करते हुए किसी भाषा समुदाय के वाग्व्यवहार से संग्रहीत किए गए हों तथा जिनकी कोशकार द्वारा इस प्रकार व्याख्या की गई हो कि योग्य पाठक प्रत्येक भाषा रूप का स्वतंत्र अर्थ समझ सके तथा उस भाषा रूप के सामुदायिक प्रकार्य संबंधी समस्त तथ्यो से अवगत हो सके।’ बर्ग की यह परिभाषा अधिक वैज्ञानिक तथा तर्कपूर्ण लगती है। जिस तरह कोश की तरह-तरह की कई परिभाषाएँ दी गई हैं उसी तरह इसके कोश के कई नाम भी दिए गए हैं जैसे कुछ हिंदी नाम- निघंटु, निरुक्त, महानिघंटु, अभिधान, शब्द कल्पद्रम, शब्दार्थ, कौस्तुभ, शब्द परिजातम, शब्द चिंतामणि, कोश, शब्दकोश, शब्द सागर, शब्द रत्नाकर, शब्द मुक्तावली, शब्द मंजरी आदि जिसमें से आज सबसे प्रचलित नामों में कोश, शब्दकोश, शब्द सागर ही है। अंग्रेजी में भी अनेको नाम मिलते हैं जिनमें कुछ प्रमुख इस प्रकार हैं- Lexicon, Dictionary, Thesaurus, Vocabulary आदि।

संस्कृत भाषा में कोश की विधा बहुत महत्त्वपूर्ण मानी जाती थी। भारत में कोशविज्ञान का उदय लगभग तीन हजार वर्ष पूर्व ही हो चुका था। वेदों के स्वरूप तथा अर्थ के संरक्षण हेतु वेदांग साहित्य का उदय हुआ। वेदों के षड़अंगो- शिक्षा संकल्प, कल्प, व्याकरण, निरुक्त, छंद तथा ज्योंतिष का उल्लेख मिलता है। वैदिक शब्दों के रूपों के ज्ञान का साधन व्याकरण है तो निरुक्त उनके अथों का निर्वचन करता है।

विश्व के सबसे प्राचीन ग्रंथ ‘निघंटु’ में वेद के कठिन शब्दों का समुच्य किया गया है। निघंटु के एक टीका के रूप में निरुक्त का निर्माण किया गया था जिसमें बारह निरुक्तकारों के नाम निर्दिष्ट किए गए तथा इसके निरुक्तकार यास्का स्वयं थे। निरुक्त शब्द की व्याख्या सायणाचार्य के अनुसार है- “अर्थ की जानकारी के लिए स्वतंत्र रूप से जो पदों का संग्रह है वही निरुक्त कहलाता है।” निरुक्त का मत है की प्रत्येक शब्द किसी न किसी धातु से अवश्य संबंध रखते हैं इसलिए निरुक्तकर शब्दों की उत्पत्ति दिखलाते हुए धातु के साथ विभिन्न प्रत्यय रूपों का निर्देश भी बतलाते हैं। यास्क पाणिनी से भी प्राचीन थे जो कि व्याकरण के आचार्य थे परंतु उन्हें भी अपने क्याकरण की आवश्यकता को देखकर धातु कोश तैयार करना पड़ा था। इस आधार पर धातुओं की संख्या लाभग दो हजार बताई गई है। पतंजलि भी क्याकरण की अनिवार्य आवश्यकता पर बल देकर कहते हैं कि कोश नहीं होगा तो भाषा का व्यवहार विशुद्ध रूप से नहीं हो सकता। कोश या शब्दकोश को भारतीय साहित्य में प्राचीन काल से ही महत्त्वपूर्ण स्थान दिया जाता रहा है। कोश को अर्थनिर्धारण के लिए सबसे अधिक प्रामाणिक व आधारभूत तत्व माना जाता रहा है। व्याकरण के साथ-साथ कोश-निर्माण की रचना भी पांडित्यपूर्ण मानी जाती रही है। इसके लिए सबसे प्राचीन नाम निघंटु है जिसकी रचना ‘प्रजापति कश्यप’ के द्वारा की गई बाद में इसी आधार पर यास्क का निरुक्त तथा अन्य कोश मॉडल तैयार होते रहे हैं। कोश एक ऐसा शब्द संकलन ग्रंथ होता है जो अकारांत वर्णानुक्रम में शब्द ऐसे संजोए जाते हैं जैसे माला या मंजरी में फूल और रत्ना या मणियुक्ता। कोश ग्रंथ स्वयं साध्य है इसका प्रमुख उद्देश्य सही सूचना, व्यक्ति को सही समय पर उपलब्ध करना है। इस उद्देश्य के पूर्ति के लिए कोश में उपयोगकर्ताओं तथा जिज्ञासुओं को अपेक्षित संदर्भ देने की दृष्टि से उसमें बोली, भाषा, साहित्य, संस्कृति, व्यवसाय विषयक शब्दों तथा उनके स्रोतों की जानकारी अध्येताओं को कम से कम समय में मिल सके, जिससे पाठक अपना आगामी रास्ता तय करने तथा भाषा के शुद्ध प्रयोग (अर्थ, लिखत, उच्चारण, व्याकरणिक जानकारी) करने में निपुण हो तथा आगे चलकर प्रबुद्ध बने।

उदा. < क़लम > उच्चारण: kalam, लिंग: पुलिंग, उत्पत्ति: अरबी से, व्याकरणिक कोटि: संज्ञा, अर्थ: प्लास्टिक या धातु से बनी एक लेखन सामाग्री... प्रयोग: भाषा नाम की पुस्तक ब्लूम फील्ड की क़लम से लिखी गई है।

मिशाल के तौर पर शब्दों के ठीक बाद कोष्ठक में शब्द का उच्चारण भी दिया जाता है। उच्चारण की व्याख्या के लिए विभिन्न स्वर सिद्धांत कोश के प्रारंभ में उसकी कुंजी स्वरूप सूची दी गई होती है। अध्येता को कोश के प्रयोग से पहले उसके संक्षेपण व प्रतीक को देखना आवश्यक होता है।

इतिहास बताता है कि पिछले डेढ़ दो सौ वर्षों में संसार के विज्ञान एवं तकनीकी आदि के क्षेत्रों में आशातीत प्रगति हुई है। अंग्रेजी के शब्दकोश में सौ सवा सौ साल पहले अधिक से अधिक लाख सवा लाख शब्द थे, किंतु विज्ञान एवं तकनीकी के विकास के साथ-साथ अंग्रेजी के कोशकरों ने नए शब्दों का निर्माण किया। अखबारों में विज्ञप्ति द्वारा अथवा अन्य स्रोतों से इस कम को संपन्न किया गया। अंग्रेजी भाषा प्रेमियों के कठिन परिश्रम का यह फल कि सौ सवा सौ वर्षों में ही अंग्रेजी शब्दों की संख्या 10-15 गुना बढ़ गई। अंग्रेजी भाषा आज यह दावा करने लगी है कि उसके कोश में आज 20 लाख से भी अधिक शब्द हैं। यदि यह सत्य है तो विज्ञान एवं तकनीकी के विकास के साथ-साथ अंग्रेजी भाषा ने अन्य भाषा के शब्दों का या तो स्वीकरण किया या फिर अपनी प्रकृति के अनुसार उन शब्दों का अनुकूलीकरण अथवा शब्द निर्माण।

पारिभाषिक शब्दावली के निर्माण कि बात बिलकुल नई है। प्राचीन से ही तकनीकी शब्दों के निर्माण में भारतीय रुचि लेते रहे हैं। इस संबंध में इतिहास में जो तथ्य मिलते हैं उनमें यह ज्ञात होता है कि सर्व प्रथम शिवाजी के समय में शासन संबंधी लगभग डेढ़ हजार सौ शब्दों की रचना की गई थी। उसके बाद इस प्रकार के शब्दों की रचना का कार्य चलता रहा बाद में सन 1906 ई. में काशी नागरी प्रचारिणी ने ‘हिंदी साइंटिफिक ग्लोसरी’ का प्रकाशन किया।

विविध स्तरीय शब्दों के चयन और उनकी व्याख्या व उद्देश्य की विशिष्टता के आधार पर शब्दकोशों के अनेक प्रकार होते हैं जैसे- भाषा के आधार पर; एक भाषी, द्विभाषी तथ बहुभाषी, भाषा काल के आधार पर; समकालिक तथा कालक्रमिक (ऐतिहासिक), प्रकृति के आधार पर; व्युत्पत्तिकोश तथा विश्वकोश, उद्देश्य के आधार पर; सामान्य कोश तथा विशिष्ट कोश इत्यादि। विशिष्ट कोश भी कई प्रकार के होते हैं जैसे- उच्चारण कोश, वर्तनी कोश, विधि कोश,चिकित्सकीय कोश इत्यादि।

प्राचीन कोश की नींव भारत से ही मानी जाती है किंतु इसका जिक्र आगे किया जा चुका है इसलिए आगे अब आधुनिक कोश की बात की जाएगी। आधुनिक कोश की शुरुआत इग्लैंड के सैमुअल जानसन ने सन 1750 ई. में रखी जिसका नाम “सैमुअल जानसन डिक्शनरी ऑफ इंग्लिश लैंग्वेज” रखा है। इस कोश में शब्दों की परिभाषाएँ भी दी है हैं जो कोशकारिता को नए आयाम देती है। असली आधुनिक कोश सन 1806 ई. में नोहा वेव्स्टर द्वारा “नोहा वेव्स्टर ए कंपैइडियस डिक्शनरी ऑफ इंग्लिश लैंग्वेज” प्रकाशित किया गया। यह कोश काफी सफल रहा है। जिसका प्रमुख कारण यह था कि साहित्यिक शब्दों के साथ-साथ कला व विज्ञान के क्षेत्रों के शब्दों को भी स्थान दिया जाना। हमारे आधुनिक परिचित कोशों में “ऑक्सफोर्ड इंग्लिश डिक्शनरी” का नाम अभी तक सबसे ऊपर है जिसके निर्माण में लगभग 100 वर्ष (1888-1988) तक का समय लगा। यह एक भाषी कोश है। ऑक्सफोर्ड प्रकाशन का ही एक सामान्य अध्येता कोश “ऑक्सफोर्ड एडवांस्ड लर्नर्स डिक्शनरी” का प्रकाशन सन 1948 में किया गया जिसके अब तक आठ संस्करण प्रकाशित किए जा चुके हैं।

आधुनिक हिंदी कोशों में “हिंदी शब्द सागर” नागरी प्रचारिणी सभा द्वारा 35 वर्षों (1910-1945) में तैयार किया गया जिसमें लगभग एक लाख प्रविष्टियाँ दी गई थी। यह कहा जा सकता है कि उस समय तक प्राप्त साधनों के आधार पर यह हिंदी का एक मात्र कोश था। बाद में इसे 11 खंडों में प्रकाशित किया गया। 1944 में हिंदी साहित्य सम्मेलन द्वारा हिंदी का दूसरा कोश “प्रामाणिक हिंदी कोश” प्रकाशित किया गया तथा उसके कुछ ही समय बाद सन 1952 में ज्ञान मंडल वाराणसी द्वारा हिंदी का एक तीसरा महत्त्वपूर्ण कोश “वृहद हिंदी कोश” कालिका प्रसाद श्रीवास्तव के संपादकत्व में प्रकाशित किया गया। बाद में इन्हीं कोशों के आधार पर कुछ प्रकाशनों ने कई तरह के कोशों का प्रकाशन करते रहे हैं। फादर कामिल बुल्के का अंग्रेजी-हिंदी सामान्य द्विभाषी कोश तथा डेनियल जोंस का अंग्रेजी उच्चारण कोश अति महत्त्वपूर्ण कोशों की श्रेणी में आते हैं। वर्धा हिंदी शब्दकोश का निर्माण वर्ष 2013 में किया गया है, हिंदी के अधिकतम प्रचलित शब्द ही इस कोश में स्थान पा सकें हैं। थोड़ा और आगे पाते हैं कि कोशों की एक दूसरी विधा का भी विकास किया गया जिसे वृहत्तम या उत्कृष्ठ रूप में “विश्वकोश” (Encyclopedia) कहा गया। विश्वकोश में शब्दों की व्याकरणिक सूचना के अतिरिक्त शब्दों से संबंधित संपूर्ण जानकारी दी जाती है जिससे पाठक भी पूरी तरह सहमत हो सके।

आज देखा जाय तो पूरी तरह से सूचना-क्रांति का समय है। कंप्यूटर का विकास पूरी धरा पर फैल गया है। सूचना-क्रांति का परिणाम यह हुआ कि कंप्यूटर के लिए इलेक्ट्रोनिक कोश (E-Dictionary) का भी निर्माण संभव हुआ। इलेक्ट्रोनिक कोश ऐसे कंप्यूटर प्रोग्राम्स होते हैं जो शब्द कोश के सभी कार्य सुलभता से करते हैं, इसके पीछे शब्दों का एक विशाल डाटाबेस प्रोग्रामिंग के सहारे कार्य करता है। इस कोश की बहुत सारी खूबियाँ हैं जो कि पारंपरिक कोशों में नहीं था जैसे- शब्दार्थों की तत्काल खोज, शब्दों का वाचन कराना तथा नए शब्दों को तत्काल जोड़ना अर्थात अपडेट करना। ये सारी विशेषताएँ पारंपरिक कोशों में संभव नहीं था। इलेक्ट्रोनिक कोश को कंप्यूटर द्वारा ऑनलाइन प्रयोग किया जाता है या कंप्यूटर में इंस्टाल करके ऑफलाइन भी प्रयोग में लाया जाता है। इस क्रांति का एक और लाभ यह हुआ कि इससे समय का भी बचत संभव हुआ।

इलेक्ट्रोनिक कोशों के आने पूर्व ही डॉ. हरिदेव बाहरी के अनुसार राष्ट्रीय ग्रंथालय कलकत्ता से 1964 में भरतीय भाषाओं के 2190 कोशों की सूची प्रकाशित हुई जो बड़े ही परिश्रम व अन्वेषण से तैयार की गई थी। इसमें अनेक विश्वविद्यालयों, संस्थानों, प्रकाशनों का सहयोग प्राप्त था। इस प्रकार से कहा जा सकता है कि हिंदी कोशों की संख्या अंग्रेजी की अपेक्षा काफी अधिक थी।

अंत में इसमें कोई संदेह नहीं कि कोश भाषा के मनकीकरण में अपनी भूमिका नहीं निभाते हैं, किंतु इससे यह मानना बिलकुल भ्रांतिपूर्ण होगा कि कोशकार भाषा का मानकीकरण जानबूझकर करता है। होता यह है कि कई बार कोश का प्रयोग लोग सत्य, उचित आदि के लिए देखते हैं और धीरे-धीरे ये ही रूप मान्यता प्राप्त कर लेते हैं। यद्यपि कोश का प्राथमिक उद्देश्य उच्चारण व वर्तनी शुद्धि तथा अर्थ निर्धारण के लिए प्रयोग किया जाता था जब कि अब इसका प्रयोग भाषा शिक्षण, भाषा नियोजन, सामग्री निर्माण इत्यादि में भी किया जाता है।

संदर्भ-

§ Jackson, Howard (2002), Lexicography: An Introduction, Routledge Publication, London.

§ सिंह, राम आधार (1990) कोश विज्ञान: सिद्धांत एवं प्रयोग, दक्षिण भारत हिंदी प्रचार सभा, मद्रास.

§ शुक्ल, त्रिभुवननाथ (1996) कोश निर्माण: प्रविधि एवं प्रयोग, जयभारतीय प्रकाशन, इलाहाबाद.


बृजेश कुमार यादव : लेखक महात्मा गांधी अंतरराष्ट्रीय हिंदी विश्वविद्यालय, वर्धा में शोधरत हैं। संपर्क: brijesh.bhu08@gmail.com

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